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04 February, 2020

शेयर बाज़ार में मंदी (Bear Phase) के दौरान कौन सी गलतियां नहीं करनी चाहिए?

एक आम निवेशक की कहानी समझते हैं।

एक निवेशक है 'राजू ' जिसने 100 से ज्यादा कंपनियों की बैलेंस शीट, प्रॉफिट लॉस स्टेटमेंट, कैशफ्लो स्टेटमेंट इत्यादि पढ़कर और समझकर कुछ 10 ऐसी कंपनियों का चयन किया जिन्हे वो लम्बी अवधि के लिए खरीद सके

  • उसने यह भी देख लिया की भारत के जाने माने बड़े बड़े निवेशकों ने और म्यूच्यूअल फंड्स ने भी उसके चयन किये हुए कंपनियों के शेयर खरीद रखे हैं। इस से उसका आत्मविश्वास और ज्यादा बढ़ गया है।
  • अब राजू ने हर कंपनी के 1 लाख रुपये के शेयर खरीद लिए। कुल मिलाकर 10 कंपनियों में उसने 10 लाख रुपये निवेश कर दिए। अब वह शान्ति से बैठ गया की उसने 'लम्बी अवधि' के लिए निवेश कर दिया है और उम्मीद करता है की उसके निवेश पर वह अच्छे रिटर्न्स कमा लेगा।
  • 1 साल तक सब सही हो रहा होता है, बाज़ार में तेज़ी चल रही है, सेंसेक्स बढ़ रहा है, उसके निवेश किये हुए 10 कंपनियों में से 6–7 कंपनियां भी अच्छा मुनाफा दे रहे हैं। राजू बहुत खुश है।
  • लेकिन अगले साल शुरू होती है 'मंदी'। राजू को लगता है की यह छोटा मोटा करेक्शन है। राजू अपनी पढ़ी हुयी किताबों (द इंटेलीजेंट इन्वेस्टर) की बातें दोहराता है जिसमे लिखा गया है की अच्छे फंडामेंटल वाले कंपनी के शेयर को कभी बेचना नहीं चाहिए, 'लम्बी अवधि' में वह बहुत मुनाफा देंगे।
  • लेकिन यह 'करेक्शन' लम्बा चल रहा होता है, फिर भी राजू नहीं समझता की मंदी आ चुकी है। खुदको सांत्वना देने के लिए वह यूट्यूब में रामदेव अग्रवाल जैसे दिग्गज निवेशकों के मोटिवेशनल वीडियो देखता है जो कहते हैं 'बाई राइट सिट टाइट'।
  • वह समझ जाता है की उसने अच्छे फंडामेंटल वाले शेयर खरीदे हैं, अब उसे इस मंदी से हो रखे घाटे की वजह से परेशान नहीं होना चाहिए, उसने आराम से बैठना चाहिए क्योंकि कुछ ही समय बाद बाज़ार में फिर तेज़ी आ जाएगी, और राजू तो 'लॉन्ग टर्म इन्वेस्टर' है
  • लेकिन होता उल्टा है, अब तो न्यूज़ चैनल और अखबारों में भी छप जाता है की मंदी आ चुकी है। राजू के निवेश किये हुए 10 कंपनियों में से 5 के शेयर की कीमत आधी हो चुकी है और बाकी 5 कंपनियों में 25% का नुक्सान हो रहा है। अब राजू को डर लगता है, लेकिन वह वारेन बफेट की बात को याद करता है की 'एक अकल्मन्द निवेशक उस समय शेयर खरीदता है जब बाकी सभी 'गधे' बेच रहे होते हैं।'
  • राजू को समझ में आ जाता है की उसे और शेयर खरीदने की जरुरत है क्योंकि उसके पास मौका है सस्ते दामों में ज्यादा शेयर खरीदने का।
  • राजू पैसों का जुगाड़ करता है और उन 10 कंपनियों के और शेयर खरीद लेता है। खरीदते समय वह बहुत खुश हो रहा होता है की 'न्यूज़ चैनल वाले सब शार्ट टर्म वाली मेंटालिटी के शिकार हैं, मैं तो लॉन्ग टर्म इन्वेस्टर हूँ, अगले साल जब तेज़ी आएगी, तो मेरे शेयर की कीमतें दोगुनी हो जाएँगी'।
  • अगले साल तेज़ी जरूर आती है, निफ़्टी और सेंसेक्स में नया जोश आता है, कंपनियों के शेयर के दाम बढ़ते हैं लेकिन राजू ने जिन कंपनियों में निवेश किया है, उनके दाम नहीं बढ़ते हैं। 10 में से 3 कंपनियों के दाम बढ़ रहे हैं लेकिन बाकी कंपनियां घाटे में ही चल रही हैं।
  • राजू परेशान, अब वह सोशल मीडिया में अपने सवालों का जवाब ढूंढ़ने लगता है और कोई जवाब ना मिलने पर, दिल पर पत्थर रखके अपने शेयर को बेच देता है। 10–20 लाख रुपये के कुल निवेश पर 40% का घाटा सहने के बाद बचे हुए पैसों को म्यूच्यूअल फंड में डाल देता है।

यह सिर्फ राजू की कहानी नहीं है, कई आम निवेशकों की कहानी है जो लम्बी अवधि के निवेशक हैं।

यहां मैं किताबी बातें ना करते हुए निजी अनुभव की बातें बताऊंगा। निजी रूप से मैंने 2008 की मंदी, 2011 की मंदी, 2015 की मंदी और 2018 से चल रही मंदी का अनुभव किया है।

मैंने जो सीखा वह साझा करता हूँ

  • अपने खरीदे हुए शेयर के भाव गिरने से, और ज्यादा खरीद कर उसे एवरेज करने की कोशिश ना करें। जब साफ़ साफ़ दिख रहा है की डाउनट्रेंड शुरू हो चुका है, तब पूरी तरह से अपने पोजीशन को बेच दें।
  • निवेश और मौलिक विश्लेषण की मोटी मोटी किताबों में लिखा हुआ है की अच्छी कंपनियों के शेयर को हमेशा पकड़ कर रखें, और जब मंदी का समय आये तब और ज्यादा खरीदें।
    लेकिन यहां एक बात समझने की जरुरत है, वह यह की यह सब बातें उन निवेशकों के लिए लिखी गयी है जिनका निवेश कई करोड़ रुपये का है, क्योंकि करोड़ों के शेयर खरीदने और बेचने में समय लगता है, टैक्स लगता है और एक ही प्राइस पॉइंट पर नहीं बेचा जा सकता।
  • लेकिन एक आम निवेशक मुश्किल से 10-20 लाख रुपये लगाकर निवेश करता है। जब डाउनट्रेंड शुरू हो, तो एक सेकंड में आराम से अपना पोजीशन बेच सकता है। 'लम्बी अवधि' का निवेशक बन ने की कोशिश ना करें। इस कोशिश में लाखों लोगों ने लाखों रुपये गवां दिए हैं।
  • अगर अपने होल्ड किये हुए शेयर आप नहीं बेचना चाहते, तो मंदी के समय, अपने पोजीशन के लिए 'इन्शुरन्स' खरीद लीजिये। 'इन्शुरन्स' मतलब निफ़्टी/सेंसेक्स के फ्यूचर लोट को शार्ट करके बैठिये या फिर पुट ऑप्शन खरीद कर बैठिये। पोर्टफोलियो में हो रहे घाटे की भरपाई पुट ऑप्शन से होती रहेगी।
  • आप अगर ऐसा समझते हैं की बैलेंस शीट वगैरह पढ़ लेने से पता लगाया जा सकता है की कोई कंपनी लम्बी अवधि में मुनाफा देगी, तो यह पूरी तरह से गलत है। लम्बी अवधि में फायदा वही कंपनी देती है जिसका मुनाफा हर साल बढ़ता है। या फिर घाटा हर साल कम हो रहा होता है और कुछ साल बाद मुनाफे में आने की उम्मीद होती है।

मंदी के समय बहुत ही संभलकर रहें। नया निवेश तभी करें जब मंदी ख़त्म होने के आसार नज़र आएं, जब बाज़ार निचले स्तरों से बढ़ते हुए दिखाई दे।

मैं लम्बी अवधि के निवेश को गलत नहीं बता रहा हूँ, मैं खुद एक निवेशक हूँ, बस इतना कहना चाहता हूँ, की 'रिजिड मेंटालिटी' के ना बनें

5000 कंपनियों में से अगले मारुती सुजुकी और इनफ़ोसिस जैसे मल्टीबैगर जरूर मिलेंगे लेकिन उसके लिए उन कंपनियों के काम करने के तरीकों को समझने की जरुरत है, ना की उनके अनगिनत रेश्यो को।


Source: Quora

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